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International Journal of
Social Science and Humanities
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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में छत्तीसगढ़ के बस्तर रियासत की भू-राजस्व व्यवस्था: एक ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक अध्ययन
Authors
Dr. Deepak Verma
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बस्तर रियासत (छत्तीसगढ़) की भू-राजस्व एवं प्रशासनिक व्यवस्था के क्रमिक विकास, स्वरूप और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का गहन विश्लेषण करता है। 1854 में नागपुर राज्य के ब्रिटिश साम्राज्य में विलय तथा 1886 के उपरांत बस्तर के प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में आने के बाद, यहाँ की पारंपरिक वस्तु-विनिमय एवं कौड़ी-आधारित अर्थव्यवस्था का औपनिवेशिक भू-राजस्व सुधारों से सीधा संपर्क हुआ। इस अध्ययन में पारंपरिक आकलन इकाइयों जैसे श्नागरश् (हल) एवं श्कोरकीश्, मालगुजारी/ठेकेदारी बंदोबस्तों के उतार-चढ़ाव, 1898 ई. में राय साहब पंडित आलमचंद द्वारा संचालित श्संक्षिप्त बंदोबस्तश् तथा 1904 के मृदा-इकाई (Soil-Unit) आधारित कैडस्ट्रल सर्वेक्षण का आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है। साथ ही, रियासत में प्रचलित गैर-कृषि उपकरों (पान पीती, घईता पोनी, भेंट-बेगार) और मुआफी व्यवस्था की पड़ताल करते हुए यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार मध्यस्थ वर्ग (मालगुजारों/ठेकेदारों) के लाभ और राज्य की आय वृद्धि की नीतियों ने जनजातीय कृषकों पर कर का दोहरा बोझ डाला।
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Pages:109-111
How to cite this article:
Dr. Deepak Verma "19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में छत्तीसगढ़ के बस्तर रियासत की भू-राजस्व व्यवस्था: एक ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक अध्ययन". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 109-111

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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में छत्तीसगढ़ के बस्तर रियासत की भू-राजस्व व्यवस्था: एक ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक अध्ययन | International Journal of Social Science and Humanities