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VOL. 4, ISSUE 2 (2022)
बीकानेर की रंगमंचीय परंपरा और गंगा थियेटर
Authors
अनुजा कटारा
Abstract
रंगमंच लोकानुरंजन के साधन के साथ सामाजिक चेतना को जागृत करने और मानवीय संवेदनाओं को आलोड़ित करने का सशक्त जरिया है। राजस्थान में भी लोकनाट्य विधाओं उदाहरणतः भवई, गवरी, तमाशा, तुर्रा कलंगी, रामलीला, रासलीला, ख्याल इत्यादि की समृद्ध मंचन परंपरा रही है। ऐसी ही परंपरा राजस्थान के बीकानेर क्षेत्र में भी फली फूली। आरंभ में यहाँ लोक नाटकों के मंचन की परंपरा स्वतः स्फूर्त थी। यहां की रंगमंचीय परंपरा को समृद्ध बनाने में स्थानीय कला संस्थाओं और शिक्षण संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। पारसी थिएटर के आगमन ने इस परंपरा को और समृद्ध बनाया। बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी ने आम जन के सांस्कृतिक उत्थान और आमोद प्रमोद के लिए 20वीं सदी के चौथे दशक में बीकानेर के गंगा निवास पब्लिक गार्डन में गंगा थिएटर की सुंदर इमारत का निर्माण करवाया। उस समय उपलब्ध आधुनिकतम टेक्नोलॉजी से सुसज्जित यह मंच बीकानेर के रंगमंच को लोकप्रिय बनाने की दिशा में एक सराहनीय पहल थी। रंग कर्मियों के लिए यह अत्यंत उत्साह जनक था। बीकानेर के कलावंतो ने यहां अनेक नाटकों की प्रस्तुतियां दी जिन्हें बड़ी संख्या में शामिल हो दर्शकों ने सराहा। इन नाटकों के प्रदर्शन की सफलता ने यह साबित कर दिया कि यदि उपयुक्त मंच उपलब्ध हो तो नाटक के दर्शक हमेशा से रहे हैं। हालांकि आगे चलकर यहां सरकार ने व्यावसायिक फिल्मों के प्रदर्शन को प्रारंभ कर दिया, जिसकी वजह से रंगमंचीय प्रस्तुतियां कम होने लगी, क्योंकि फिल्मों के प्रदर्शन के बीच नाटकों की प्रस्तुतियों के लिए समय निकालना मुश्किल होने लगा।
प्रस्तुत पत्र के माध्यम से बीकानेर की प्रारंभिक रंगमंच की परंपरा का अध्ययन करने के साथ ही शासकीय प्रयासों के महत्व को भी समझने का प्रयास किया गया है। साथ ही उन संभावना को तलाशने का भी प्रयास है जिससे एक बार फिर से गंगा थियेटर को पुनर्जीवित कर बीकानेर की रंगमंचीय परंपरा को और समृद्ध बनाने का प्रयास कारगर हो सके।
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Pages:186-188
How to cite this article:
अनुजा कटारा "बीकानेर की रंगमंचीय परंपरा और गंगा थियेटर". International Journal of Social Science and Humanities, Vol 4, Issue 2, 2022, Pages 186-188
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